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तुम तो ख़ुद से ही,अपना ये हाल बेकार किए बैठे हो

SHASHANK SRIVASTAVA

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम तो ख़ुद से ही,अपना ये हाल बेकार किए बैठे हो
        
                                                    
                            
सारा दुख दर्द दुनियादारी,अपने ही भीतर क्यों समेटे हो ।।
ये क्या हाल बना लिया है “शशांक” तुम ज़िंदा तो हो
कि तुम ख़ुद से ही ख़ुद का अंतिम संस्कार किए बैठे हो ।।

ये बिस्तर का एक कोना,तुम्हारी आँखों में अनगिनत आँसू बहते है
यार उठकर देखो तो हमको,इस दुनिया में हम सब भी रहते है
अपना एक खूबसूरत जीवन तुम अब तार-तार किए बैठे हो
कि तुम ख़ुद से ही ख़ुद का अंतिम संस्कार किए बैठे हो ।।

आख़िर चाहत क्या है तुम्हारी,यहाँ कौन सी आफ़त आ गई है
ये कौन से ग़म के बादल हैं,है कौन सी आँधिया,जो हर ओर छा गई है ।।
ये लो देखो आईना तुम,ख़ुद से ही तकरार किए बैठे हो
कि तुम ख़ुद से ही ख़ुद का अंतिम संस्कार किए बैठे हो ।।

दुखो के भीड़ में ये क्या तुम सारी ख़ुशियाँ छाँट जा रहे हो
अपनी ही अर्थी उठाये काँधे पर घर से चौबे घाट जा रहे हो
हर रिश्ते,नाते,दोस्ती,यारी से ये क्या तुम इनकार किए बैठे हो
कि तुम ख़ुद से ही ख़ुद का अंतिम संस्कार किए बैठे हो ।।
-शशांक श्रीवास्तव
एक महीने पहले
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