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पुलवामा पर कुछ मुक्तक

Shashank Misra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ मुक्तक
        
                                                    
                            
एक
आस्तीन में पलें सांपों को जब तक न कुचला जायेगा
हम परीक्षाएं कितनीभी दे लें परिणाम कभी न आयेगा
बैठक चर्चाएं बातें हैं होतीं और होती भी रहेंगी मित्रों
मां बाप बहन भाई पत्नि न रोये ऐसा दिन कबआयेगा।

दो
हम सब साथ साथ पर सैनिकों के शव कब तक गिनते जाएंगे
वह दिन कब आयेगा जब इनकी छाती पर चढ़ के तिरंगा फहरायेंगे
देश कह रहा बहुत हो चुका अब धैर्य नहीं रख सकते हम हैं
शहादत की परीक्षायें अनेक दे लीं परिणाम लेकर कौन आयेंगे ।
तीन
गणतंत्र दिवस राजपथ पर पृथ्वी अर्जुन ब्रह्मोस आदि दिखलाते हैं
देश की आत्मा पर हो रहे हमलों में प्रयोग क्या इनका कर पाते हैं ।
जबतक यह मेला उत्सव के हम शव सैनिकों के गिनते ही जा रहे
घातक से घातक हथियार भी क्या जब सबक न शत्रु को सिखलाते हैं ।


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