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माँ — जो चुप रही, फिर भी ममता थी

Sharda Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            माँ वो नहीं जो कहे — “आजा मेरी गोद में”,
        
                                                    
                            
माँ वो है जो बोले नहीं,
पर उसकी चुप्पी
तेरे भाग्य की रचना कर जाए।

वो थपकी नहीं देती,
पर हर गिरने पर
तेरे पैरों के नीचे धरती बिछा देती है।

वो न लोरी गाती है,
न आँसू पोंछती है —
पर उसकी मौन छाया
तेरी पीड़ा की भाषा बन जाती है।

वो कहती नहीं — “डर मत”,
पर उसकी आँखों में
तेरे लिए एक ऐसी आग जलती है,
जो तुझे निर्भय कर जाती है।

माँ वो नहीं जो पुचकारे,
माँ वो है जो निखारे,
जो तुझे इस तरह ढाले
जैसे मृदंग में गूंजती
एक द्रुत ताल की थाप —
कोमल, फिर कठोर —
फिर रचयिता।

वो नहीं रोकती तुझे आँधियों से,
बस एक फूल सी बात कह जाती है —
“जा, तू हवा में उड़,
अगर गिर भी पड़ी —
तो जान, मेरे आँगन की मिट्टी
तेरे लिए ही बनी थी।”

वो जब मुस्कुराती है —
तो जैसे कोई दीया
तूफ़ानों से आँख मिलाकर
जलने लगता है।

वो जब चुप होती है —
तो जैसे कोई वीणा
अपने ही मौन में
संगीत बुनती है।

माँ वो नहीं जो कहे,
“मैं हूँ तेरे साथ”,
माँ वो है जो दूर खड़ी
तेरे भीतर
तेरा साहस बन जाए।

और जब तू टूटी हुई देह से उठती है —
वो नहीं आती तुझे पकड़ने —
बस एक सरस स्वर हवा में तैरता है,
“मैं तुझमें हूँ,
तू अब मुझे नहीं पुकारे —
तू अब खुद एक माँ है,
जो पुचकारे नहीं, निखारे।”

माँ — वो धुन है,
जिसे तू ताउम्र गुनगुनाती है,
बिना जाने कि वो कभी बोली भी थी।
एक वर्ष पहले
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