विज्ञापन

उत्तम क्षमा : प्रतीकात्मक–आध्यात्मिक गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन-मंदिर के द्वार खोलकर, आज अहं का क्षय कर लें,
        
                                                    
                            
द्वेष-धूम के दीप बुझाकर, अंतर अपना निर्मल कर लें।

वाणी के विष-बाण सभी अब, मौन-सुधा में गल जाएँ,
कटु स्मृतियों के शुष्क पत्ते, करुणा-वृष्टि में धुल जाएँ।

जिससे मन में राग जगा था, उससे भी सद्भाव रहे,
जिसने पीड़ा दी जीवन में, उसके प्रति मैत्री-भाव रहे।

क्षमा बने हिमशैल हृदय का, क्रोध-अनल को शीतल कर,
अंतर की हर गाँठ खोलकर, चेतन-सरिता निर्मल कर।

मैं भी निर्दोष नहीं जग में, मुझसे भी अपराध हुए,
मेरे कारण जाने कितने, नयनों में अवसाद हुए।

उन सबके चरणों में नत हूँ, आज क्षमा मैं माँग रहा,
अपने अंतर-तम को धोकर, आत्म-ज्योति में जाग रहा।

क्षमाभाव के फूल खिलें तो, काँटे भी मुस्काने लगें,
टूटे मन के सूने आँगन, फिर से दीप जलाने लगें।

उत्तम क्षमा केवल शब्द नहीं, आत्मा का अभिषेक बने,
‘मैं’ की अंतिम शिला पिघलकर, ‘समता’ का आलोक बने।

पर्व कहे—निज मन को जीतें, जग जीतने की चाह न हो,
क्षमा-सुधा से चित्त सींचकर, भीतर कोई दाह न हो।

जिस क्षण क्षमा हृदय में उतरी, उसी क्षण बंधन टूट गए,
द्वेष-तमस के बंद कपाटों से, चेतन-सूर्य स्वयं फूट गए।

क्षमा जहाँ निष्कलुष हुई तो, कर्म-मल भी धुलता है,
निर्मल होती आत्म-ज्योति जब, मुक्ति-पथ वहीं खुलता है।
- सनातन मुकुंद
4 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Aditya Mishra

1 कविता

View Profile

Anil Pandey

436 कविताएं

View Profile