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थोथा चना बाजे घना

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रिक्त घटों में शब्द बहुत, अंतर किंतु उजाड़ है,
        
                                                    
                            
छिछले जल पर धूप अधिक, तल में गहरा ज्वार है।
जिसके भीतर दीप न जला, जग को ज्ञान सिखाता है,
थोथा चना बाजे घना—युग का सत्य बताता है।

अक्षर थोड़े क्या पढ़ डाले, पांडित्य इतराता है,
अधकचरा ज्ञान स्वयं को संपूर्ण वेद बताता है।
प्रश्नों की आँखें बंद किए, उत्तर बाँटे जाते हैं,
जिनको अपनी राह न सूझे, पथ के ज्ञाता बनते हैं।

मंच सजे, जयकार उठे, शब्दों का व्यापार चले,
सत्य अकेला मौन खड़ा हो, झूठ हजारों बार पले।
तालियों की क्षणभंगुर गूँज में अंतर-स्वर खो जाता है,
बाह्य प्रकाश बढ़ता जाता, अंतर तम रह जाता है।

सोशल-जगत की चकाचौंध में ज्ञान प्रदर्शन बनता है,
क्षणिक यश की दौड़ में हर चेहरा आगे बढ़ता है।
जितना भीतर रिक्त हुआ मन, उतना बाहर दावा है,
आत्मप्रशंसा के कोलाहल में दब जाता अभाव है।

फल से लदी हुई डाली तो सहज धरा को छूती है,
जल से भरा हुआ घट अपनी पूर्णता में झुकता है।
सागर अपनी गहराई का ढिंढोरा कब पीटता है?
सत्य जहाँ गंभीर हुआ, मौन वहीं मुखरित होता है।

शब्दों में यदि सत्य न हो तो शब्द सभी आडंबर हैं,
ज्ञान वही जो जीवन बदले, शेष सभी बस स्वर हैं।
जिसने अपने मन को जीता, उसको जग जीतना क्या है?
जिसके भीतर सत्य जगा हो, उसको और कहना क्या है?

ऊँची वाणी, रिक्त विचार—यह कैसी विद्वत्ता है?
अहंकार के आवरणों में कैद हुई प्रज्ञा है।
जो जितना ही पूर्ण हुआ, उतना सरल दिखाई देता—
थोथा चना बाजे घना—मौन सत्य यह कहता है।
- सनातन मुकुंद
एक महीने पहले
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