द्वंद्व की वेदी पर निज प्राण तजते रहे,
मृगतृष्णा के पीछे हम यूँ ही सजते रहे।
चयन की भ्रांति में खोई चेतना की धार,
विकल मन के विकल्प बस यूं ही भजते रहे।
तिमिर की गोद में बैठा अनजाना प्रहर,
भीति की आहटों में कांपता अंतः-ज्वर।
शून्य की रिक्तता में व्याप्त है सन्नाटा,
भय के पाश में सिमटा हृदय का अंतरघर।
कहीं स्वर्ण के कलश, कहीं सूखी है धार,
विधि की लेखनी में है अटपटी सी मार।
धरा की कोख में भी एक ओर है वसंत,
विषमता के शिखर पर खड़ा है हाहाकार।
मुखौटों की भीड़ में सत्य मौन खड़ा,
झूठ के प्रासाद में हर स्वप्न है लड़ा।
रजत की आभा में ताम्र का है ओज,
असत्य के आवरण में व्यक्तित्व है पड़ा।
दर्पण के पृष्ठ पर एक धुंधली है छवि,
मृण्मय काया में खो गई है आत्म-रवि।
विकृति के साये में निखरती है व्यथा,
कुरूप के अट्टहास में मौन हुआ कवि।
-सनातन मुकुंद