जिस डाली से झरे पात, लौटें न फिर शाखों पर,
कितना भी मधुमास बुलाओ, कलियाँ खिलें न डालों पर।
स्नेह-सलिल से सींचो तरुवर, नव-पल्लव मुसकाएँ,
सूखी जड़ फिर हरी न होती, अश्रु-नीर बरसाने से॥
कोयल लाख पुकारे फिर भी, क्या पाषाण पिघलता है?
जो धारा पथ बदल चुकी हो, तट कब तक उसे बुलाता है?
मृगमरीचिका के पीछे दौड़ें, प्यास कहाँ बुझ पाती है?
बंद कली को लाख मनाओ, कब वह खिलने पाती है?
जिन फूलों में गंध न बाकी, वे उपवन की शान नहीं,
जिन तरुओं की छाँह न मिले, वे पथिकों के मीत नहीं।
जो आँधी में दीप बुझाएँ, वे उजियारे के मीत नहीं,
जो तरु की जड़ काटें, वे मधुमास के मीत नहीं॥
रेत-महल ढह जाता है, पहली लहर के आने पर,
छल से सींची प्रेम-लता पर, फूल कहाँ मुसकाते हैं?
विश्वास-वृक्ष पर प्रेम-बेल, स्नेह-सलिल से पलती है,
ईर्ष्या का विष जड़ में उतरे, प्रेम-विटप मुरझाता है॥
घनघोर घटाएँ घिरती हैं, बिजली नभ में चमकती है,
पथरीली घाटी में जब, जीवन-धारा थमती है।
जो नाव डुबोए मँझधार में, उसको खेवैया मत मानो,
जो नाव में छेद करे, उसको रक्षक मत जानो॥
दीप वही जो आँधी में भी, अविराम जलता जाए,
मीत वही जो संकट में भी, हाथ पकड़कर साथ चले।
वचन नहीं, व्यवहार देखना, विपदा में पहचानना,
स्वर्ण अग्नि में निखरता, मीत विपद में पहचाना॥
सूखे पात न जोड़ो फिर से, बीती हुई बहारों से,
गंध न लौटे मुरझाए फूलों में, लाख मनुहारों से।
जो बीज बचा हो मिट्टी में, उसको फिर से सींचना,
जो जड़ से ही सूख चुका हो, उसको फिर क्या सींचना॥
- सनातन मुकुंद