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सिंदूरी साँझ : शृंगारिक गीत

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सिंदूरी साँझ सजी अम्बर पर, मधुर मिलन-संदेश लिए,
        
                                                    
                            
लज्जित नभ के अरुण कपोलों पर, सपनों का परिवेश लिए।

ढलते रवि ने क्षितिज चूमकर, संध्या का शृंगार किया,
रजनी नव-वधू-सी घूँघट में, मिलने का अभिसार किया।

गोधूलि की धूमिल रेखाएँ, माँग धरा की भरती हैं,
मानो प्रियतम के कर-कमलों से, प्रेम-रेखाएँ उभरती हैं।

मंद पवन के मृदु स्पर्शों में, तेरा अहसास उतर आता है,
तेरी स्मृति का हर झोंका ही, मन में फूल खिलाता है।

पाखी लौटे अपने नीड़ों को, गोधूलि मुस्काती है,
तेरी यादों की मृदु पदचापें, मन-द्वारे आ जाती हैं।

नभ के आँचल पर तारों की, रजत मालिका सजती है,
तेरे नयनों की चंचल छवि बन, हर इक किरण उतरती है।

सिंदूरी साँझ की बेला में, मन अनुराग सुनाता है,
मौन अधरों पर भी चुपके से, प्रेम-गीत गुनगुनाता है।

ढलती संध्या कह जाती है— प्रेम अमर उपहार रहा,
हर विरहाग्नि के अंतर में भी, मिलन सदा साकार रहा।

सिंदूरी इस मधुर घड़ी में, जीवन का शृंगार खिला,
ढलते सूरज की बाँहों में भी, नव-अनुराग प्रसून खिला।
-सनातन मुकुंद
3 महीने पहले
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