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सिंदूरी सांझ : गीत

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सिंदूरी सांझ सजी अम्बर पर,
        
                                                    
                            
केसर-किरण बिखराती है।
रवि के श्रान्त कपोलों पर वह,
मृदु चन्दन-लेप लगाती है।

पश्चिम-पथ के स्वर्ण-कपाटों पर,
अरुणाभा मुस्काती है।
दिन के दीप बुझाकर चुपके,
रजनी को राह दिखाती है।

नीड़-निकेतन लौटे विहग सब,
कलरव-हार सजाए हैं।
वन-वीणा के मन्द्र स्वरों में,
मलयानिल गीत सुनाती है।

सरिता के निर्मल दर्पण में,
संध्या निज मुख निहार रही।
लहरों की चंचल अलकों पर,
कुमकुम-रेखा छिटकाती है।

नील गगन के विस्तृत उर पर,
तारक-दल मुस्काते हैं।
मौन व्योम की ध्यान-मुद्रा में,
ज्योत्स्ना-दीप जलाते हैं।

क्षणभंगुर जीवन की सीमा पर,
यह अनुपम संधिकाल खड़ा।
नश्वरता के सूने वन में,
शाश्वत बीज उगाती है।

सिंदूरी सांझ सिखा जाती है—
हर अस्त नया उद्गम होगा।
हर अवसान की गोद से ही,
नव प्रभात निकल आता है।
-नातन मुकुंद
3 महीने पहले
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