स्वर्णिम क्षितिज की कोर पर, मुस्काया नव स्वप्न महान,
नन्ही मुट्ठी में सूरज बाँधने, लेकर निकला स्वप्न-विहान।
रेतीली धरती पर खेल रहा, नभ छूने का मौन विधान,
लहरों की लय में सुनता है, अनंत गगन का गूढ़ गान।
न सीमा का भय, न बंधन का भार, न राहों का अंधकार,
नन्ही काया में धधक रहा, संभावनाओं का ब्रह्मांड अपार।
सूर्य-किरणें बन मंत्र-ज्योति, उसके साहस को सहलाएँ,
नील व्योम की निस्तब्ध दिशाएँ, उसके स्वप्नों को अपनाएँ।
मुट्ठी भर रेत में देखो, सृष्टि-बीज मुस्काता है,
बाल-मन का निर्मल विश्वास, असंभव को झुकाता है।
जो सूरज को छूने निकला, वह स्वयं प्रभा बन जाता,
जो सपनों में सत्य जगाता, वह युग को राह दिखाता।
बाल-मन केवल कोमलता नहीं—अग्नि-संकल्प की धारा है,
उसकी आँखों में छिपा हुआ, भविष्य स्वयं उजियारा है।
यह उड़ान नहीं केवल आकाश की—अंतरिक्ष से भी पार है,
नन्हे सपनों की ज्योति में, मानवता का नव-संसार है।
-सनातन मुकुंद