समय का पहिया घूम रहा, क्षण-क्षण जग को साध रहा,
उदय-अस्त के चक्र तले, जीवन-दीप को बाँध रहा।
कल की छाया ढलती जाती, आज नया आकार धरे,
बीते पथ की धूल समेटे, अज्ञात क्षितिज पुकारे।
ऋतु के रथ पर दिन सरकते, रातें मौन उतरती हैं,
रेत-घड़ी की सूक्ष्म धार में, आयु-रेखाएँ झरती हैं।
जो आया है, जाएगा निश्चित, जग केवल एक पड़ाव,
श्वास-श्वास में काल छिपा है, जीवन क्षण का बहाव।
राजमहल हों या वन-प्रांतर, सब पर काल-विधान रहा,
कालचक्र के सम्मुख जग में, कौन यहाँ बलवान रहा?
अहंकार के दीप बुझाकर, अंतर-ज्योति जगा मन में,
कालातीत को खोज ले भीतर, नश्वरता के क्षण में।
बाहर जितना चक्र घूमता, भीतर उतना मौन खिले,
निज सत्ता में दृष्टि डुबोकर, शाश्वत के संकेत मिले।
काल नहीं केवल गति जगत की, चेतन का विस्तार है,
क्षण के कण में ब्रह्म विराजे, यही काल का सार है।
- सनातन मुकुंद