नील-व्योम के मौन पट पर, ज्योति-लेख जब खुलता है,
कण-कण में चिद्रूप प्रभाकर, चेतन-रस बन घुलता है।
नेत्र निहारें रूप जगत का—रूप स्वयं ही माया है,
दृश्य वही, जो दृष्टि लाँघकर, आत्म-तत्त्व में मिलता है।
शैल-कुहर से सुधा-सलिल बन, धरती का अभिषेक करे,
पाषाणों के सुप्त हृदय में, प्राण-स्पंदन का लेख भरे।
तट-तट की जड़ता हरती हुई, सागर-सत्य की ओर बढ़े,
नर्मदा बन अंतःप्रवाहिनी, जीव-जगत् का संस्कार करे।
बिंदु-बिंदु में सिंधु समाहित, तरंगों में विस्तार रहे,
क्षण-क्षण ढलता रूप जगत का, फिर भी नित्य आधार रहे।
जो मूल-स्रोत में लीन हुआ, वह कालातीत स्वरूप हुआ,
रेवा बन चेतन-धारा बहे, स्वयं में स्वयं साकार रहे।
मौन-गुहा में नाद अनाहत, सूक्ष्म दिशाएँ भरता है,
श्वास-श्वास में ओंकार-ज्योति, चेतन-दीपक धरता है।
कर्ण-स्पर्श से परे जहाँ स्वर, आत्मा का संवाद बने,
श्राव्य वही, जहाँ निःशब्द ब्रह्म, अंतर में उच्चरता है।
- सनातन मुकुंद