प्रेम नयन की प्यास नहीं है, प्रेम स्वयं मधुधार है,
प्रेम नहीं केवल मिलन है, प्रेम विरह का सार है।
प्रेम दीप अंतःतम में जलता, स्वयं प्रभा का द्वार है,
प्रेम शून्य में नाद अनाहत, प्रेम अनंत विस्तार है।
प्रेम कुसुम की गंध बनकर, प्राण-प्राण में व्याप्त है,
प्रेम सुधा बनकर अधरों पर, मौन में भी प्राप्त है।
प्रेम नदी है सिंधु की ओर, प्रेम पथिक का धाम है,
प्रेम-बिंदु में सिंधु समाया, प्रेम स्वयं निष्काम है।
प्रेम देह की सीमा नहीं है, प्रेम चिदाकाश अपार है,
प्रेम स्वयं को भूल जाना, निज स्वरूप साकार है।
प्रेम जहाँ ‘मैं’ मौन हुआ तो, ‘तू’ ही तू साकार है,
प्रेम जहाँ द्वैत विलीन हुआ, प्रेम वहीं निर्विकार है।
प्रेम न बंधन, प्रेम मुक्ति है, प्रेम सहज उपहार है,
प्रेम समर्पण की ज्वाला, जिसमें अहम् का हार है।
प्रेम न माँगे रूप-रंग कुछ, प्रेम न चाहे मान,
प्रेम जहाँ सब अर्पित हो, प्रेम वहीं भगवान।
प्रेम श्वासों में गुप्त मंत्र है, प्रेम हृदय का ध्यान है,
प्रेम स्वयं आराध्य बन जाए, प्रेम वहीं संधान है।
प्रेम मिला तो जगत् मिला है, प्रेम गया तो शून्य,
प्रेम ही जीवन का तत्त्व है, प्रेम ही परिपूर्ण है।
-सनातन मुकुंद