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प्रतीक्षा क्यों है? : रहस्यवादी–दार्शनिक विरहगीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नयन-पंथ पर दीप जले, फिर पथ इतना सूना क्यों है?
        
                                                    
                            
श्वास-श्वास में जो बसे, मन फिर उसका प्यासा क्यों है?

साँझ उतरकर मौन हुई, फिर बाँसुरी-सी तान कहाँ?
चाँद ढला, फिर अंतस में यह उजला-सा भान कहाँ?

जिसे कभी खोया ही नहीं, उसकी इतनी प्यास क्यों है?
जो अंतर में नित्य विराजे, उससे मिलने की आस क्यों है?

निशि के नीरव नभ में फिर, कौन अनदेखा तारा है?
बंद नयन के अंतर में, किसका चिर उजियारा है?

स्पर्श बिना जो छू जाता, वह कैसा मधुर इशारा है?
दूर खड़ा जो पास लगे, वह कौन हमारा प्यारा है?

मन-मंदिर की वीणा पर, कौन अनसुना राग जगाता है?
शून्य-गर्भ की गहराई से, कौन मुझे फिर पास बुलाता है?

जिसे खोजता फिरता जग में, वह भीतर मुस्काता है—
मिलन-द्वार पर आकर भी, मन क्यों दूर चला जाता है?

काल-सरित बहती जाती, मन का तट ठहरा क्यों है?
अंतस-द्वार खुला हुआ, फिर पथिक अकेला क्यों है?

शून्य-कुंज में अनहद स्वर, किसका संदेश सुनाता है?
मौन हृदय के बंद कपाटों पर, कौन दस्तक देता है?

विरह मिलन की प्यास जगाए, अंतस क्यों अकुलाता है?
जो मुझमें ही नित्य विराजे, उसकी प्रतीक्षा क्यों है?
- सनातन मुकुंद
2 घंटे पहले
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