पावस! तव अभिसार-बेला, प्राण-प्राची पुलकिता,
श्याम-घनावलि प्रिय-छवि, चेतना चिर-विलसिता।
नभ-नूपुर निनदित निशीथे, दामिनि-द्युति मुस्काती,
मलय-पवन-मृदु-परिरंभे, कुसुम-गंध महकाती।
नीरद-वीणा-नाद-माधुरी, अंतर-तंत्री झंकृत,
प्रिय-पद-रव से प्राण-पुरी आलोकित।
यमुना-जल-लहरी-ललिता, चंद्र-छवि अपनाती,
कदंब-कुंज-छाया, स्मृति-सुधा छलकाती।
विरह-वह्नि स्नेह-सुधा बन, अंतस में उतराती,
पावस-अभिसार-बेला, निज-सुधि बिसराती।
बिंदु-बिंदु झरता अंबर, मानो मंत्र सुनाता,
हरित धरा का रोम-रोम, नवजीवन भर जाता।
लोचन-दीप प्रज्वलित, अंतर-ज्योति जगाते,
प्रिय-पद-रव की चिर-आस, प्राण समर्पित॥
पावस केवल मेघ-मिलन का, उत्सव मात्र नहीं,
जीव-ब्रह्म-अभिसार-सुधा का, दिव्य प्रसंग यहीं।
अहं-तमिस्रा गल जाती, चिदाकाश उद्भासित,
श्याम-सुधाकर-सान्निध्ये, चेतना चिर-विलसित।।
- सनातन मुकुंद