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नयनों के तीर : श्रृंगारिक भावगीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नयनों के तीर चले तो, हृदय-कमल विदीर्ण हुआ,
        
                                                    
                            
मृदु-स्मित की रश्मि पड़ी तो, विरह-तमस विलीन हुआ।

नील-नयन की नीलिमा में, मधुर प्रणय-संसार मिला,
पलकों की शीतल छाया में, चिर-अभिलषित अनुराग मिला।

अधर-मुकुल जब मौन खिले तो, मधु-सौरभ अंतस भर गया,
एक चितवन का स्पन्दन जैसे, रोम-रोम में राग भर गया।

चन्द्र-किरण-सी कोमल दृष्टि ने, प्राण-प्रांगण भर दिया,
मूक प्रणय की वीणा ने फिर, मधुर अनाहत स्वर दिया।

नयनों के उन मौन बाणों ने, मन का मर्म जगा दिया,
एक तुम्हारी मौन चितवन ने, स्वयं प्रेम को स्वर दिया।
- सनातन मुकुंद
2 घंटे पहले
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