चूम शिलाओं के चरण, हँसती चली सलिल-रागिनी,
त्याग तटों का मोह, बनी जीवन की अनुगामिनी।
बाधाओं से हार न मानी, गति ही जिसका धर्म रहा,
घाट-घाट अमृत बाँट रही, स्वयं सदा निष्कामिनी।
नीर नहीं, वह मौन तपस्या, पर्वत का संचित उच्चार,
सागर की अनदेखी धुन पर झूम उठी अनुरागिनी।
कल-कल में वेदों की वाणी, लहरों में उपनिषद्-स्वर,
हर भँवर में गूँज रही है कालजयी वैरागिनी।
चलना, झुकना, अहं तजकर असीमता पा जाना,
बूँद-बूँद में ब्रह्म समेटे, अद्वैत-दीप प्रज्वालिनी।
निर्मल मन का दर्पण बनकर, मलिन हृदय भी धो जाती,
अपने उर में सबको रखकर रहती फिर भी त्यागिनी।
जीवन का यह सत्य सुनाती— रुकना ही अवसाद यहाँ,
बहते रहना ही उत्सव है, गति ही परम साधिनी।
नदी नहीं, वह स्वयं प्रकृति के अंतर का स्पंदन है,
जो उसको पहचान सके, बन जाए स्वप्रकाशिनी।
- सनातन मुकुंद