अविरल अनंत शैल-शिखरों से जन्म लेती,
हिम-हृदय की पवित्र मौन-प्रार्थना-सी बहती,
नदी चलती है—काल के स्कंधों पर स्थित होकर
अपनी निःशब्द यात्रा का अमर भार सहती।
कभी वह शैशव-सी चंचल, पत्थरों से खेलती,
कभी गंभीर ध्यान-सी गहन खोहों में लिपटी,
स्वर-तरंगों में गूँजती प्राचीन ऋचाओं-सी,
वह प्रकृति के अंतरतम की वेदना है लिखती।
वनों की हरित वीणाओं पर पद-संचरण करती,
पुष्पित तटों पर नवजीवन का गीत बिखेरती,
सूर्य की स्वर्णिम किरणों को कर में धारण कर,
वह दिगन्त तक प्रकाश-संकल्प विस्तृत करती।
कभी नगरों के मध्य वह मौन-सी थक जाती,
मानव-लोभ के कलुष से अपनी धारा छलकाती,
फिर भी करुणा की अजस्र धवल ध्वजा उठाए,
वह स्वयं को पुनः निर्मलता में ही ढालती।
सागर की ओर बढ़ती वह विरहिणी यात्री-सी,
अनजान मिलन के स्वप्नों में मग्न साध्वी-सी,
जहाँ अंत होता है, वहीं उसका आरम्भ खुलता—
नदी नहीं—यह काल की सतत काव्य-धारा ही है।
- सनातन मुकुंद