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मौन की राजमुद्रा : रहस्यवादी प्रतीक-गीत

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            किसने प्रथम प्रभात से पहले अँधियारे को छुआ था,
        
                                                    
                            
किसके संकेतों पर शून्य ने अपना द्वार खोला था।

किस अदृश्य उँगली ने नभ पर यह नीली लिपि उतारी,
जिसे पढ़-पढ़ दिग्वधुओं ने अपनी यात्रा स्वीकारी।

पीपल की जर्जर नस-नस में किसकी धड़कन बहती थी,
निर्झर की टूटी वीणा में किसकी तानें रहती थीं।

किसके पदचिह्नों की स्मृति में धूल सुनहरी लगती थी,
किसके आने की आहट से संध्या सजती थी।

दीपक क्यों हर रात स्वयं को अग्नि-पत्र लिखता है,
पतंगा किस अनलिखे आदेश पर जलने को दिखता है।

नदियाँ किस अनुबंध-विहीन आकर्षण में बहती हैं,
पर्वत किस अनसुने वचन पर चुप्पी ओढ़े रहते हैं।

तारे किस दरबार के प्रहरी बनकर जागा करते हैं,
और ग्रह किसके इशारों पर अपनी गति धरते हैं।

जब-जब मन के सूने आँगन में कोई दस्तक होती है,
और बिना वाणी के भीतर कोई वाणी होती है,

जब उत्तर से पहले ही प्रश्नों का वन झर जाता है,
और पाने से पहले ही कुछ अपना-सा लग जाता है,

तब लगता है— किसी असीम साम्राज्य की सीमा से,
कोई अदृश्य राजमुद्रा लेकर आया है चुपके से।

नाम नहीं उसका कोई, रूप नहीं, आकार नहीं,
फिर भी उससे रिक्त जगत में कोई भी व्यवहार नहीं।

युगों से वही शून्य-राज्य का संदेश लिए फिरता है—
सृष्टि उसे जिस नाम से जाने, वह एक हरकारा है।

— श्री सनातन मुकुंद
3 महीने पहले
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