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मौन के उस पार : रहस्यवादी–दार्शनिक गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शून्य-शिखर पर कौन जला, अंतर का निःशब्द दीप,
        
                                                    
                            
बूँद-बूँद में सिंधु घुला, फिर भी क्यों लगता समीप?

काल-कपाटों पर कौन लिखे, अनदेखे अस्तित्व-लेख,
श्वास-श्वास में कौन बहे, बनकर अदृश्य आलोक-रेख?

नील-वितान के तले, कौन जगाए मौन पुकार,
नयनों के निर्जन तट पर, क्यों ठहरा अनंत अपार?

मृगतृष्णा के दर्पण में, किसका प्रतिबिंब हुआ साकार,
जिसको बाहर खोज रहा, वह बैठा अंतस के पार।

रात स्वयं जब दीप बनी, तम ने ओढ़ लिया उजास,
बुझते-बुझते जान लिया, ज्वाला ही थी अपनी श्वास।

पथ भी भीतर, पथिक भी भीतर, भीतर ही मंज़िल का द्वार,
जिसे प्रतीक्षा नाम दिया, वही मिलन का प्रथम उद्गार।

मैं ही प्रश्न, मैं ही उत्तर, मैं ही मौन, मैं ही पुकार,
मैं ही बूँद, मैं ही सागर, मैं ही तट, मैं ही विस्तार।

जब ‘मैं’ का अंतिम स्वर टूटा, मिटा द्वैत का अंधकार,
तब प्रतीक्षा विलीन हुई, खुला मौन का गहन द्वार।
- सनातन मुकुंद
एक महीने पहले
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