समय ने नगर के बीचोंबीच
एक विशाल तम्बू खड़ा कर दिया है।
लोग उसे जीवन कहते हैं।
उसके द्वार पर प्रवेश करते ही
हर नवागंतुक को
एक भूमिका सौंप दी जाती है—
किसी को सिंह होना है,
किसी को हाथी,
किसी को विदूषक,
और किसी को
रस्सी पर चलने वाला वह कलाकार
जिसके नीचे
असफलताओं की अथाह खाई है।
दर्शक दीर्घा भरी हुई है।
तालियाँ हैं,
प्रशंसाएँ हैं,
उपाधियाँ हैं,
और उन सबके बीच
एक मौन भी है
जो किसी को सुनाई नहीं देता।
सिंह दहाड़ते हैं—
पर उनकी गर्जना के भीतर
भय का एक काँपता हुआ शावक
छिपा बैठा रहता है।
हाथी चलते हैं—
पीठ पर लादे हुए
वंशों की अपेक्षाएँ,
कर्तव्यों के पर्वत,
और अधूरे स्वप्नों के साम्राज्य।
लोग उनकी शक्ति देखते हैं,
उनकी थकान नहीं।
विदूषक हँसते हैं।
उनके चेहरे पर रंग है,
आँखों में चमक है,
होंठों पर विनोद है—
किन्तु रात्रि के अंतिम प्रहर में
जब दीप बुझ जाते हैं,
तब वही विदूषक
अपने आँसुओं का
एकमात्र दर्शक रह जाता है।
तम्बू के मध्य खड़ा है
एक रिंगमास्टर।
उसका नाम है—
महत्वाकांक्षा।
उसके हाथ में
स्वर्णमय चाबुक है।
वह पुकारता है—
और ऊँचा छलाँग लगाओ।
और अधिक प्राप्त करो।
और अधिक बनो।
और अधिक दिखाई दो।
और मनुष्य
तालियों के पीछे दौड़ते-दौड़ते
अपने ही पदचिह्न खो देता है।
धीरे-धीरे
मुखौटे चेहरे बन जाते हैं,
और चेहरे
स्मृतियाँ।
फिर एक दिन
किसी आत्मा को स्मरण आता है—
वह जन्म से कलाकार नहीं थी।
न उसे दहाड़ना था,
न अभिनय करना था,
न रस्सियों पर संतुलन साधना था।
वह तो केवल
आकाश को देखने आई थी।
तब वह
तम्बू के पर्दे को धीरे से हटाती है,
शोर को पीछे छोड़ देती है,
और पहली बार
अपने भीतर की निस्तब्धता को सुनती है।
उसे ज्ञात होता है—
प्रेम किसी पिंजरे में नहीं रहता,
करुणा किसी चाबुक से नहीं चलती,
और आत्मा का आकाश
किसी सर्कस की छत से कहीं बड़ा होता है।
तम्बू अब भी खड़ा है।
दर्शक अब भी ताली बजा रहे हैं।
सिंह अब भी दहाड़ रहे हैं,
विदूषक अब भी मुस्कुरा रहे हैं,
रस्सियाँ अब भी तनी हुई हैं।
किन्तु जो बाहर निकल आए हैं,
वे जान चुके हैं—
मनुष्य का अंतिम सत्य
अभिनय नहीं,
प्रेम है।
- सनातन मुकुंद