मंच सजे, दीपक जले, शब्दों का अंबार,
फिर भी क्यों सूना लगे साहित्य का संसार?
तालियों की तात्कालिकता दबाती मन का स्वर,
दृश्य बहुत हैं चारों ओर, दृष्टि हुई बेअसर।
स्क्रीन पर शब्द उग रहे, वन में जैसे घास,
हर रचना को चाहिए अब क्षणिक-सा उजास।
लाइक बने साहित्य का मानक, शेयर बने प्रमाण,
अक्षर चुप हैं पूछते—कहाँ बचा उनमें प्राण?
शीर्षक पढ़कर वाह-वाह, चित्र देखकर मान,
बिना पढ़े टिप्पणी—“सुंदर! अद्भुत! महान!”
शब्द खड़े हैं द्वार पर, लेकर अपना मर्म,
पाठक के कुछ पल माँगें—पढ़ना भी तो धर्म।
भीड़ बढ़ी तो मंच बढ़े, बढ़ता गया प्रचार,
अंतस का एकांत घटा, घटता गया विचार।
रचना जो थी साधना, बन बैठी प्रदर्शन,
कवि खोज रहा खुद को, खोकर सृजन।
सम्मानों की रोशनी में कितने दीप म्लान,
प्रमाणपत्रों के भार तले दबता सृजन-प्राण।
जिस रचना में दर्द नहीं, वह कितनी भी सुंदर,
शब्दों का श्रृंगार व्यर्थ, यदि सूना हो अंतर।
पर दोष अकेले मंच का कहना होगा अन्याय,
मंच ने तो द्वार खोले, दिया विचारों को आकाश।
दोष वहाँ जब मंच बने केवल यश का द्वार,
साहित्य पीछे छूटे और आगे बढ़े प्रचार।
रचनाकार! ठहर ज़रा, कलम उठाने से पहले पढ़,
जीवन की धूल छूकर फिर शब्दों में संवेदना भर।
स्वयं पूछो—लिखता हूँ क्या केवल दिखने के लिए?
या किसी अनदेखे मन में बोने को एक आवाज़?
पाठक! तू भी लौट चल, थोड़ी धीमी चाल,
पढ़कर ही दे रचना को अपना सच्चा मान।
एक सहृदय पाठक मिले—उत्सव है अपार,
एक सत्य पंक्ति बचा ले भीतर का संसार।
मंचों! इतना याद रहे—भीड़ नहीं साहित्य,
संख्या से नापा नहीं जाता शब्दों का सामर्थ्य।
मंच की रोशनी बुझ जाए, थम जाए जयकार,
फिर भी जो भीतर जलता—वही शब्द साकार।
न लाइक बड़ा, न संख्या बड़ी, न नाम बड़ा, न मान,
सबसे बड़ा वह स्पर्श, जो बदल दे युग और इंसान।
साहित्य वहीं जीवित है, जहाँ जीवित हो संवेदना,
जहाँ शब्दों में साँस रहे, जहाँ जागे अंतर्चेतना।
मंच रहे, सम्मान रहे, पर रचना रहे प्रधान,
भीड़ भले अनदेखी करे—सत्य ही बने पहचान।
मंच से मन तक यात्रा हो, शब्दों में विश्वास,
रचनाकार की सच्चाई हो, पाठक की हो प्यास।
भीड़ नहीं बचाती साहित्य—बचाता अंतर्मन;
जब शब्द मनुष्य को छू लें, तभी सार्थक है सृजन।
- सनातन मुकुंद