कृतज्ञता की कंचन-धुन पर, अंतर-वीणा गाए,
अनुग्रह-अम्बर से झर-झर, करुणा-कुसुम बरसाए॥
जो कुछ पाया, दान वही था, मेरा कहाँ ठिकाना,
श्वास-श्वास में लिख गया कोई, मौन-प्रभा का गाना॥
झुकता मस्तक दीप बनाकर, अहं-तमस गल जाता,
'मैं' का कण जब शून्य हुआ तो, पूर्ण स्वयं मिल जाता॥
कृतज्ञ हृदय का एक प्रणाम, युग-युग यज्ञ जगाता,
नत अंतर में वही अनश्वर, चिदानन्द मुस्काता॥
-सनातन मुकुंद