किसे सुनाए दिल का हाल, सभी दिशाएँ मौन हुईं,
पीर-प्रदीप की लौ बन, साँसें भी अब गौण हुईं।
अश्रु-अर्घ्य बनी स्मृतियाँ, मन-गंगोत्री स्वर बरसाती है,
वेदना-वीणा के तारों पर नीरव रागिनी गाती है॥
चाँद भी ओढ़े मेघ-वसन, नयनों का आकाश पढ़े,
रात स्वयं तपस्विनी बनकर, स्वप्नों के उपवास गढ़े।
अंतर के निर्जन मंदिर में अनहद नाद स्वयं जगते,
टूटे दर्पण में भी देखो, ब्रह्म-किरण के रूप दमकते॥
जिसको अपना कह न सके, वही श्वासों में बस जाता,
विरह स्वयं उपनिषद् बनकर मौन-ऋचाओं को दोहराता।
दिल का हाल न जग सुन पाए, आत्मा सुन मुस्काती है—
प्रेम जहाँ निःशब्द हुआ, वहीं ब्रह्म-वाणी गाती है॥
- सनातन मुकुंद