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कामिनी नहीं, कामना : अन्योक्ति-गीत

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            किस वन से आई सखि री, चितवन में चंचल प्रमाद,
        
                                                    
                            
अधरों पर मधुमास सजाए, उर में बोती विष-उन्माद।

कुंतल-जाल क्षितिज तक फैले, बाँधे नभ के मुक्त विहंग,
मृदु मुस्कानों की वीणा पर, झंकृत हुईं मोह-तरंग।

कुंतल-कुंज, कपोल-कमल सब, स्वप्न-सरोवर के प्रतिबिंब,
छूते ही जल-रेखा जैसे, बिखर गए सब माया-बिंब।

पायल बोली—"आओ पथिक!", नूपुर गाए—"यहीं ठहरो।"
मन ने खोला द्वार विकारों का, प्राण कहें—"लौटो, अब उबरो।"

जब अंतःकरण-ज्योति जगी, खुला रहस्य स्वयं ही तब,
कामिनी कोई देह न थी— मन की कामना थी सब।

रूप नहीं बंधता बंधन में, बंधन उपजे आसक्ति,
जिसने मन को जीत लिया, बन जाता परम-ज्योति।

अब न चितवन मोह जगाती, न मधु-राग भरमाता है,
आत्मदीप के एक प्रकाश में स्वयं ब्रह्म मुस्काता है॥
- सनातन मुकुंद
2 महीने पहले
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