संयम-सूत्र धरो मानव, जीवन का श्रृंगार यही।
संतुलन ही सृष्टि-सुरक्षा, युग का सत्य-विचार यही॥
सीमित धरणी, सीमित साधन, सीमित जीवन-क्षेत्र यहाँ।
अतिवृद्धि की उन्मत्त गति से, बढ़ता प्रतिपल त्रास यहाँ।
प्रज्ञा-पथ का प्रथम सोपान, संयम का संस्कार यही।
संतुलन ही सृष्टि-सुरक्षा, युग का सत्य-विचार यही॥
वन की हरितिमा नित्य लहके, निर्झर का कलगान बहे।
अन्न, जल, वायु और धरणी, जीवन का वरदान रहे।
प्रकृति-पूजन ही संस्कृति का, शाश्वत शुभ-आचार यही।
संतुलन ही सृष्टि-सुरक्षा, युग का सत्य-विचार यही॥
शिक्षित गृह, संस्कारित संतति, उज्ज्वल भावी काल बने।
नारी-गरिमा से आलोकित, प्रत्येक सुसंस्कृत परिवार बने।
गुण-वैभव से दीप्त समाज का, शाश्वत आधार यही।
संतुलन ही सृष्टि-सुरक्षा, युग का सत्य-विचार यही॥
संख्या से उत्कर्ष न मिलता, मिलता सत्संस्कारों से।
राष्ट्र-विभव आलोकित होता, श्रम, संयम, सदाचारों से।
सुखी परिवार, समृद्ध धरा का, मंगलमय विस्तार यही।
संतुलन ही सृष्टि-सुरक्षा, युग का सत्य-विचार यही॥
आओ, मिलकर व्रत दोहराएँ, जागृत हो जन-जन का मन।
संयम, सेवा, सद्बुद्धि से हो, आलोकित नवयुग का क्षण।
विश्व-वसुधा के कल्याण का, शाश्वत मंगल-मंत्र यही।
संतुलन ही सृष्टि-सुरक्षा, युग का सत्य-विचार यही॥
-सनातन मुकुंद