जय जय कात्यायनी माता,
जय सिंहवाहिनी कल्याणी।
महिषासुर-मर्दिनि, दुर्गे,
जय जगदम्बे भवानी॥
शरद-चंद्र-सी विमल प्रभा, मुख पर अरुणिम लाली,
मंदस्मित से मन हर लेतीं, माँ कात्यायनी॥
जय जय कात्यायनी माता,
जय सिंहवाहिनी कल्याणी।
महिषासुर-मर्दिनि, दुर्गे,
जय जगदम्बे भवानी॥
अधर्म-तिमिर हरकर माँ,
सत्य-सुधा बरसाओ।
दुर्बल जन का संबल बन,
न्याय-पथ दिखलाओ॥
मोह-निशा के पट खुल जाएँ,
विवेक-किरण मुस्काए।
काम-क्रोध के दुर्ग ढहें माँ,
मन निर्मल हो जाए॥
जय जय कात्यायनी माता,
जय सिंहवाहिनी कल्याणी।
महिषासुर-मर्दिनि, दुर्गे,
जय जगदम्बे भवानी॥
दया-दृष्टि से शुष्क हृदय में,
प्रेम-सुमन खिल जाएँ।
भेद-भाव की दीवारें ढहें,
विश्व बने परिवार हमारा॥
श्रद्धा, शक्ति, विवेक दो माँ,
भक्ति-सुधा बरसाओ।
चरण-कमल में शीश झुकाकर,
माँ, अपना बनाओ॥
जय जय कात्यायनी माता,
जय सिंहवाहिनी कल्याणी।
महिषासुर-मर्दिनि, दुर्गे,
जय जगदम्बे भवानी॥
-सनातन मुकुंद