विज्ञापन

जाग मुसाफिर जाग : प्रतीकात्मक–रहस्यवादी गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रात गई, अब भोर हुई है, जाग मुसाफिर जाग,
        
                                                    
                            
अंतर में इक ज्योति जली है, जाग मुसाफिर जाग।

मृगजल के पीछे क्यों भागे, तृष्णा लिए अनुराग?
रेत-रेत में क्या पाएगा, छोड़ मोह का राग।

पथ के काँटे पूछ रहे हैं, किसकी है यह चाल?
पदचिह्नों के मौन अक्षर में, लिखता कौन सवाल?

श्वासों की इस क्षीण डगर पर, कौन छेड़ता तान?
मौन कुएँ की गहराई में, कौन जगाता प्राण?

देह-नगर की बंद गली में, कौन जलाता दीप?
नेत्र मूँदकर देख मुसाफिर, कौन खड़ा है समीप?

काल-नदी की धार प्रबल है, बहता जीवन-नीर,
क्षण की नाव लिए मत सोना, नश्वर तेरा शरीर।

जिसे खोजता वन-वन भटका, वह तेरे ही पास,
आँख खुली तो मिट जाएगा, दूरी का आभास।

मंजिल कोई दूर नहीं है, पथ ही उसका द्वार,
जिस क्षण जागा अंतर-यात्री, खुला स्वयं संसार।

तू ही पथ है, तू ही पथिक है, तू ही अंतिम धाम,
अपने भीतर उतर मुसाफिर, सुन अनहद का नाम।

रात गई, अब नींद गई है, त्याग मोह का राग,
द्वार खुला है सत्य-नगर का, जाग मुसाफिर जाग।
-सनातन मुकुंद
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all