अधूरा ख़्वाब नयनों में, अब भी दीप जलाए।
सूने मन के आँगन में, चुपके फूल खिलाए।
समय धुएँ-सा बह निकला, दृश्य बदलते गए।
एक किरण अंतर्मन में, नव विश्वास जगाए॥
ओस भरे हर पात पर, स्मृतियों के अक्षर।
साँझ उतरते ही मन में, गूँजे मधुर स्वर।
हार नहीं अंतिम सत्य, पुरुषार्थ पुकारे।
टूटा पंख भी चुन लेता, साहस का शिखर॥
क्षितिज सदा दूर रहा, पग फिर भी बढ़ते।
तम के भीतर स्वप्न-दीप, चुपचाप ही जलते।
पूर्ण हुआ जो थम गया, समय की देहरी पर।
अधूरे स्वप्न ही आगे, नव इतिहास गढ़ते॥
खोना भी वरदान बने, यदि मन न बिखरे।
सूखे वन में भी देखो, सावन फिर उतरे।
पूर्ण नहीं—खोज ही जीवन का उत्सव।
अधूरा ख़्वाब लिए, मानव हर पल निखरे॥
- सनातन मुकुंद