किस अनदेखे नीरव नयनों से, चिद्-बूँद उतर आई?
किस चिद्-सागर की मौन लहर ने, जग में राह बनाई?
शून्य-गर्भ की गहन समाधि से, प्रथम स्पंद बन निकली,
'एकोऽहम्' की मौन चेतना, 'बहुस्याम्' बनकर खिली।
मेघ-मुकुट के ध्यान-कमल से, करुणा बन धरती उतरी,
तृषित धरा के वन-उपवन में, जीवन-ज्योति पुनः बिखरी।
शैल-शिखर से सरिता बनकर, 'मैं' का तट बहा लाई,
हर कण में निज रूप निहार, अपना नाम भुला आई।
सागर ने बाहें फैलाकर, निज स्वर में उसे समाया,
बूँद नहीं—वह स्वयं अनन्त थी, जिसने खेल रचाया।
रवि की सूक्ष्म तपः-किरण ने, फिर आकाश बुलाया,
आना-जाना स्वप्न मात्र था—स्वयं स्वयं को पाया।
जो बूँदों में सिंधु निहारे, वही रहस्य को जाने—
अंश नहीं, पूर्णत्व ही सत्य; अंतर उसे पहचाने।
यात्रा का यह अंत नहीं है— पूर्ण यहीं झलकाता,
बूँद जहाँ निज अहं विसर्जित करे, ब्रह्म स्वयं मुस्काता॥
— श्री सनातन मुकुंद