किस क्षितिज से लौटे फिर वे, स्मृति-दीप के दो उजले पल?
जिनमें सोया था अंतर्मन, जैसे नीरव कोई कमल॥
काल-सिंधु की गहरी लहरें, बहा ले गईं जिनके पदचिह्न।
फिर भी चेतन-आकाशों में, गूँज रहे वे मौन-प्रसंग॥
एक पल था प्राण-वसंत का, जिसमें हँसी थी हरियाली।
दूजा पल था मौन साधना, जिसमें जागी अंतर्ज्योति निराली॥
रेत-घड़ी की सूनी मुट्ठी, फिर कैसे मोती बरसाए?
शायद प्रेम-प्रभा के स्पर्शों ने, बीते क्षण फिर पास बुलाए॥
जो खोया था बाह्य दिशाओं में, वह भीतर आकर मिल जाता।
आत्मा के निर्मल दर्पण में, हर बिछड़ा स्वर खिल जाता॥
दो पल केवल समय नहीं थे, वे तो चेतन के मधुर विधान।
एक बना था स्मृति-सुमन, दूसरा बना आत्मा का गान॥
क्षण-क्षण में जो सत्य छिपा है, वही अनंत का द्वार खोलता।
लौट नहीं आते पल जग में, पर मन उनका अर्थ टटोलता॥
जब अहं-तमस का क्षय होता, जब मौन हृदय में दीप जलाता।
तब दो पल की वह वापसी, जीवन को फिर पूर्ण बनाता॥
-सनातन मुकुंद