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धरा का क्रंदन और चेतना का स्वर

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वसुधा व्याकुल पुकारती, थकी धरा का मौन प्रहर।
        
                                                    
                            
सीमित साधन, असीमित तृष्णा, बढ़ा रहा है जन-ज्वर।
अनियंत्रित वेग-सिंधु में, लुप्त हुआ मर्यादा-कूल,
सभ्यता खड़ी निज अस्तित्व हेतु, ढूँढ रही संयम-मूल॥

असीम नभ भी लघु लगता, जब भू की छाती फटती है।
पल्लव-पुष्प, जल-तरंग की, कल-कल भी अब अटती है।
विपिन-क्रंदन क्या सुन पाया, मानव के इस उन्माद ने?
संसाधन के सीमित कोषों को, बाँटा स्वार्थ-विषाद ने।
सुध ले मानव! जाग्रत हो, यह कालचक्र का निस्पंदन,
सीमित जन में निहित सुख का, कर ले पावन अभिनंदन॥

'वसुधैव कुटुंबकम्' का भाव, क्या केवल शब्दाडंबर है?
यदि पेट नहीं तृप्त यहाँ, तब कैसा यह जन-भ्रम है?
शिक्षा-ज्योति जब फैलेगी, तब तिमिर स्वयं छँट जाएगा।
संतुलन का नया सूर्य, क्षितिज के पार से आएगा।
गुणवत्ता चुनें प्रखर हम, न केवल संख्या-विस्तार,
संयम-मौन से ही होगा, जग का पूर्ण शुभ-शृंगार॥

जन-चेतन की मशाल लेकर, अनुशासित जीवन अपनाएँ।
धरा के हर श्वास-स्पंदन में, नव-सृजन की राग सजाएँ।
मर्यादित हो वेग धरा का, संयम हो जीवन का सार,
तभी सध पाएगा धरणी पर, मानव का गौरव-अधिकार॥
- सनातन मुकुंद
2 महीने पहले
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