ढलती शाम ने चुपके से, दिन का दर्प उतार दिया,
रवि की अंतिम रश्मि ने, नभ का रूप निखार दिया।
स्वर्णिम पंख समेटे पंछी, लौट चले निज नीड़ों में,
चंचल प्राण उतरने लगे, अपने गहन अंतस्तलों में।
तम के कर फैलने लगे तो, दीप स्वयं मुस्काने लगा,
बाह्य प्रकाश ढला तो, आत्म-सूर्य जगमगाने लगा।
दीर्घ हुईं जब संध्या-छायाएँ, क्षण की सीमा खो गई,
काल-तरंग भी मौन हुई तो, अपनी धारा में सो गई।
पत्तों पर ठहरी ओस बनी, बीते यौवन की मधु-स्मृति,
मौन क्षितिज पर संध्या लिखती, जीवन की नश्वर गति।
ढलना अंत नहीं होता है, नव प्रभात का यह आधार,
रजनी की निस्तब्ध कोख में, पलता ज्योतिर्मय संसार।
जिसको अपना मान रहा था, सब संध्या-संग धुँधला हुआ,
‘मैं’ का सूरज अस्त हुआ तो, ‘वह’ अंतस में उज्ज्वल हुआ।
दिन भर जिसको खोज रहा था, वह तो अंतर में ही था,
ढलती शाम ने कह दिया— निज स्वरूप से दूर नहीं था।
- सनातन मुकुंद