अम्बु-कणों में ब्रह्म-ज्योति, अन्तर-गगन नहलाती।
नीर-नाद अनाहत बन, चिति-वीणा गुनगुनाती।
अम्ब-स्नेह-सुधा की छाया, जीव-लता सहलाती।
मातृ-कृपा-द्युति की धारा, सुप्त स्मृति जगवाती।
अब्ज-विकच हृदय-सर, आत्म-प्रभा छलकाता।
कमल-सौरभ-सिक्त मानस, परम-प्रेम लहराता।
अब्द-गति में सत्य नित्य, नव अनुभूति जगाता।
संवत्सर-संग चित् स्वयं, निज चिर स्वरूप दर्शाता।
भेद-विलय में दीप्त हुआ, अद्वय-दीप अखण्ड।
चिदानन्द-सिन्धु-लहरी में, विश्व विलसता प्रचण्ड॥
- सनातन मुकुंद