भारत केवल भू-रेखा नहीं, चेतन ज्योति अपार,
हिमगिरि उसका मौन तपोवन, सिंधु अनंत विचार।
गंगा उसकी स्मृति-धारा, युग का सत्य बहाती,
माटी उसकी मंत्राक्षर बन, जीवन-वेद सुनाती।
सूर्य-शिखर-सा ज्ञान जगे, मिटे तम-आवरण सारा,
‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा में, जागे भारत-बोध हमारा।
ऋत, सत्य, करुणा के दीपों से, अंतस हो आलोकित,
वसुधा को परिवार मानकर, भारत हो जग-दीक्षित।
कालचक्र के केंद्र-बिंदु पर, अक्षय दीप हमारा,
‘मैं’ में जब ‘हम’ खिले—तब भारत सबसे प्यारा।
- श्री सनातन मुकुंद
हंसवर, अंबेडकर नगर, उत्तर प्रदेश