भक्ति का पथ, आस्था का रथ, जय जगन्नाथ पुकार,
श्रद्धा-सुमनों से सुरभित होता, जग का कण-कण द्वार॥
नीलाचल से निकले नाथ, कृपा-सुधा बरसाते,
दीन-जनों के शुष्क हृदय में, प्रेम-दीप जलवाते॥
रथ के चक्र सुनाते हमको—चरैवेति का गान,
गति में ही जीवन-साधना, गति में ब्रह्म-विधान॥
श्रद्धा-रज्जु थामे जग सारा, खिंचे प्रेम के साथ,
एक डोर में बँध जाता है, जीव, जगत औ' नाथ॥
तन यह रथ, बुद्धि सारथि, मन संयम की डोर,
आत्मदीप जब प्रज्वलित हो, मिटे भव-तम घोर॥
अहंकार के अश्व थम जाऍं, शम-दम हों लगाम,
करुणा, सेवा, सत्य, समर्पण—यही जगन्नाथ धाम॥
खींच रहा है कौन किसे, यह रहस्य अनूप,
भक्त चले प्रभु की ओर कि प्रभु आएँ निज रूप॥
निर्मल अंतःकरण जहाँ हो, वहीं पुरुषोत्तम वास,
मौन प्रार्थना बन जाती है, जीवन का विश्वास॥
रथयात्रा उत्सव ही नहीं, आत्मा का उत्कर्ष,
भक्ति जहाँ निष्काम बहे, वहीं ब्रह्म का हर्ष॥
भक्ति का पथ, आस्था का रथ, चलता अंतर-धाम,
जगन्नाथ के चरणों में ही, पाता ब्रह्म-विराम॥
- सनातन मुकुंद