भादों बीते, पुरवा बोले, अँगना धूप उतराइल बा,
कजरारे बदरा के आँचर, धीरे-धीरे सरकाइल बा।
कास किनारे चाँदनी हँसे, दूब नई मुसकाइल बा,
शरद के उजरी पाँख लगाकर, मौसम गाँव नहाइल बा।
मड़ई ऊपर धुआँ उठेला, चूल्हा आज सुलगाइल बा,
गोबर-लीपा कच्चा अँगना, तुलसी-चौरा महकाइल बा।
बछिया डोले, बछड़ा कूदे, घंटी मधुर बजाइल बा,
साँझ ढले जब बाँसुरी बाजे, मनवा दूर उड़ाइल बा।
धान के बालि झुकी-झुकी बा, मन भीतर कुछ सूखल बा,
मेहनत के माथे पसीना बा, दाम मगर अब रूखल बा।
बीज बचावे वाला किसानवा, कर्ज तले जब झुकल बा,
धरती के कोखि फसल उगावे, लाभ कहीं अउरी रुकल बा।
हाट सजल बा रंग-बिरंगा, गाँव मगर अकुलाई बा,
माटी के मोल पूछे वाला, शहर में कीमत पाई बा।
कुम्हारन के चाक थमल बा, लोहे चमके बाजार में,
अपन हुनर के हाथ पसारे, गाँव खड़ा लाचार में।
पहिले चौपालन में बैठत, सुख-दुख सब बतियाइल बा,
अब मोबाइल के नन्हक डिबिया, घर-घर बीच दीवार बनाइल बा।
बूढ़ पुरनिया कथा सुनावे, सुननिहार न कोई बा,
एके छत के नीचे रहिके, सबके मन में दूरी होई बा।
नदिया के पुरनइया धारा, बालू बनि के छूट गइल,
पोखर, कुआँ, पइन सूखल, पानी आँख से रूठ गइल।
पेड़ कटे त चिरई पूछे, अब हम कहाँ बसाईं घर?
छाँह खोजता राहगीरवा, धूप खड़ी बा सिर के ऊपर।
फिर भी माटी हार न माने, अंकुर भीतर पलता बा,
सूखी डारी फूटे पत्ता, जीवन फिर से चलता बा।
एक दिया जब गाँव जलावे, सौ अँधियारा हारि जाई,
मन बदले त मौसम बदले, धरती फिर हरियाई।
आवा मिलके बीज बचाईं, जल-स्रोतों के मान करीं,
माटी, मेड़, नदी अउर वन के, अपना मान-सम्मान करीं।
जाति-पाँति के बाँट मिटाईं, श्रम के सच्चा मान करीं,
गाँव सँवरी त देश सँवरी, मिल-जुल के अभियान करीं।
भादों बीते, शरद उतरले, नूतन भोर जगाइल बा,
माटी के माथे सूरज बनके, आशा फिर मुसकाइल बा।
जवन बचल बा, ओकर खातिर, मिल-जुल हाथ बढ़ाइल बा,
गाँव सँवरी त देश सँवरी, गीत यही अब गूँजत बा।
- सनातन मुकुंद