कलमा हो या राम-नाम हो, दीप एक जलाना है,
मस्जिद हो या मंदिर, अंतस को उजियाना है।
ओढ़े कितने रंग देह ने, अंतर कौन निखारे?
चंदन मलकर क्या होगा यदि, मन में धुआँ पसारे?
वस्त्र बदलते ऋतु-ऋतु जैसे, मन कब वसन बदलता?
बाहर सूरज ढलता रहता, भीतर तम क्यों पलता?
शंख बजें, घंटियाँ गूँजें, गूँजे अज़ान-पुकार,
यदि करुणा न जागे भीतर, व्यर्थ सभी त्योहार।
जाति-धर्म की ऊँची दीवारें, किसने मन में ढालीं?
एक ही माटी, एक ही साँसें, एक ज्योति निराली।
नदियाँ अपनी धार भुलाकर, सागर में मिल जातीं,
बूँद-बूँद की भिन्न कथाएँ, लहरों में मिट जातीं।
अक्षर-अक्षर वेद पढ़े जो, अर्थ न पढ़ पाए,
ज्ञान-दीप लेकर भी अपने, अंतरतम न जगमगाए।
तर्कों के वन में भटक रहा जो, सत्य कहाँ से पाए?
मौन उतर जब हृदय-कुहर में, तब अपना स्वर आए।
मन हो निर्मल दर्पण जैसा, जग अपना दिख जाए,
द्वेष-मेघ हटते ही फिर, प्रेम-गगन मुस्काए।
अंतर की गंगाजल-धारा, जब निर्मल हो जाए,
एक बूँद में ब्रह्मांडों का, प्रतिबिंब उतर आए।
माटी की देहों पर हमने, कितने नाम लिखे हैं,
नाम मिटें तो कौन कहेगा—किसके घाव पराए?
रक्त सभी का लाल धरा पर, आँसू एक कहानी,
एक करुणा से बड़ी न कोई, पूजा की निशानी।
दीपक केवल दीप न होता, तम से उसका नाता,
जलकर अपनी देह, पथिकों को राह दिखाता।
वैसा ही जो स्वयं पिघलकर, जग का दुःख हर लेता,
उसके चरणों की धूल स्वयं, तीर्थ नया बन जाता।
आओ मन के द्वार खोलकर, भीतर दीप जलाएँ,
अपने भीतर बैठे मानव को, पहले आज बचाएँ।
जब अंतस में प्रेम खिलेगा, भेद स्वयं गल जाएँ,
भारत की मिट्टी से फिर, विश्व-प्रभात उगाएँ।
कलमा हो या राम-नाम हो, दीप एक जलाना है,
धर्म नहीं केवल कहना है—धर्म स्वयं बन जाना है।
- सनातन मुकुंद