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अधूरे स्वप्न का दीप : दार्शनिक गीत

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक अधूरा ख़्वाब नयन में, अब भी दीप जलाता है,
        
                                                    
                            
टूटे पंखों को भी प्रतिपल, नभ का मार्ग दिखाता है॥

ओस-भीगी स्मृतियों तले, मन चुपके मुस्काता है,
बीते मौसम का हर स्पंदन, फिर स्वर बनकर आता है।
चंद्र-किरण की श्वेत शिला पर, किसने नाम लिखा था तब—
समय मिटा न पाया अब तक, वह अनल-सा अक्षर।
जो खोया, वही अंतर्मन में, अमृत बन झर जाता है—
एक अधूरा ख़्वाब नयन में, अब भी दीप जलाता है॥

पथ ने कितने शूल बिछाए, पाँव मगर रुक पाए कब,
हारों की हर मौन शिला पर, अंकित होता रहा स्वप्न-रव।
धूप तपाती रही निरंतर, छाँव स्वयं बनती आशा,
अश्रु-बिंदु से सींच रही थी, जीवन की हर अभिलाषा।
टूटा तारा भी अँधियारे को, अपनी ज्योति दे जाता है—
एक अधूरा ख़्वाब नयन में, अब भी दीप जलाता है॥

क्षितिज कभी मिलता नहीं है, फिर भी पथ चलता जाता,
अपूर्णता ही सृष्टि-हृदय में, पूर्णत्व-बीज उगाती है।
जो मिल जाए, कथा वहीं पर, शायद मौन ठहर जाए,
जो अधूरा रह जाए, वही युग-युग तक गाया जाए।
अधूरापन ही जीवन को, नूतन अर्थ सिखाता है—
एक अधूरा ख़्वाब नयन में, अब भी दीप जलाता है॥

जब तक साँसों में स्पंदन है, स्वप्न अमर हो जाएगा,
एक अधूरा ख़्वाब अंततः, जीवन का स्वर बन जाएगा।
हार नहीं, यह शाश्वत आशा, मन में दीप जलाती है—
एक अधूरा ख़्वाब नयन में, अनंत प्रभात जगाती है॥
- सनातन मुकुंद
2 महीने पहले
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