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अधर्म पर धर्म की विजय : आध्यात्मिक–दार्शनिक गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तम के मस्तक पर कालिख थी, दीपक ने अभिषेक किया,
        
                                                    
                            
विषधर के फण पर सत्य ने, निर्भय होकर नृत्य किया।
छल के दुर्ग अजेय दिखते, नींव में अंगार जगे,
धर्मबीज से अंकुर फूटे, नवयुग के शृंगार जगे।

असत्य के मेघ घिरें नभ में, सत्य-सूर्य कब छिपता है?
मिथ्या का स्वर्णिम आवरण, सत्य को कब तक ढकता है?
अन्याय-दुर्ग पर न्याय-वज्र का, जब प्रचंड प्रहार हुआ,
करुणा के शीतल स्पर्श से, कठोर अहं का दर्प ढहा।

जब-जब मर्यादा रोती है, अंतर्यामी शंख बजाता है,
अधर्म-तिमिर को चीरकर, चेतना का रवि उग आता है।
राख तले चिंगारी पलती, एक दिवस ज्वाला बनती,
धर्मचक्र फिर गति पाए, नवसृजन का पथ खुल जाए।

विजय केवल शत्रु-दमन नहीं, निज विकारों का क्षय भी है,
धर्म केवल बाह्य आचरण नहीं, अंतःकरण की शुचिता भी है।
जहाँ सत्य निष्काम तपे, वहाँ काल शीश झुकाता है,
जब भीतर धर्मदीप जलता, युग का तम मिट जाता है॥
- सनातन मुकुंद
7 घंटे पहले
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