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अमर-ज्योति : वीरों को श्रद्धांजलि

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रक्तिम प्रभात की अरुणिम किरण, वीरों की गाथा गाए,
        
                                                    
                            
माटी का कण-कण आज यहाँ, चरणों में शीश नवाए।

हिमशिखरों पर दीप जले, नभ में ध्वज लहराए,
बलिदानों की अमर सुगंध, पवन-पंख पर छाए।

जिनके रक्त से रंजित धरती, चंदन-सी मुस्काए,
जिनकी शौर्य-ज्योति से तम-साम्राज्य ढह जाए।

सीमा पर प्रहरी-शिला बने, वे वज्र-वक्ष बलिदानी,
उनकी हर धड़कन लिखे, भारत की अमर कहानी।

माँ की आँखों के अश्रु बने, गंगा की निर्मल धारा,
उनकी स्मृति में झुकता नभ, झुकता सागर सारा।

तिरंगा नभ का सूर्य बने, केसरिया अरुण प्रभात,
श्वेत बने शांति का संदेश, हरित बने नव-उत्थान।

वीरों! तुम दीपक बन जलते, हममें ज्योति जगाते,
अपने अमर पराक्रम से, युग-युग पथ दिखलाते।

जब तक साँसों में स्वर होगा, जब तक भारत गाए,
तब तक तुम्हारे बलिदान की, अमर कथा मुस्काए।

शत-शत नमन तुम्हें, हे वीरों! शत-शत वंदन हो,
भारत-माता के चरणों में, नित नव-अभिनंदन हो।

वंदे मातरम्!

— श्री सनातन मुकुंद
2 महीने पहले
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