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तुम्हें क्या मिलेगा

Shanti Swaroop

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यूं ज़िन्दगी को समझने से, तुम्हें क्या मिलेगा !
        
                                                    
                            
उस से खामखा उलझने से, तुम्हें क्या मिलेगा !

ख़ुशी से जी लो जितना भी लिखा है नसीब में,
यूं ही दिल में गुबार भरने से, तुम्हें क्या मिलेगा !

जो दिया है ख़ुदा ने बस सब्र कर उतने पे यार,
यूं हर चीज़ पर मर मिटने से, तुम्हें क्या मिलेगा !

दुनिया में वैसे भी क्या कमी है ग़मों की दोस्त,
अपने आप से ही यूं लड़ने से, तुम्हें क्या मिलेगा !

मिल जाये यूं ही सब तो ख़ुदा की क्या ज़रुरत,
सोचो उसके खिलाफ जाने से, तुम्हें क्या मिलेगा !

गर आम मीठे है तो जी भर के खा जाओ "मिश्र",
यूं ही बेकार में उन्हें गिनने से, तुम्हें क्या मिलेगा !

शांती स्वरूप मिश्र


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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