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हमें और अभिभावकों की ज़रूरत नहीं

shaista shakil

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            माँ की कोख से निकले
        
                                                    
                            
संग संग खेले संग संग बड़े हुए
लड़ते रहे झगड़ते रहे भाई बहन के रूप में
हम साथ साथ पलते रहे

जब बड़े हुए तो दीदी दोस्त बनी
पर भईया कुछ सख्त नज़र आने लगा
नहीं स्वीकार थी खुद की बराबरी हमसे
वो खुद को अभिभावक समझने लगा

समय बदला और बड़े हुए तो जाना
जब संग संग खेले और बड़े हुए थे
समय के साथ फिर हमारे संग क्यों ये भेद खड़े थे

वह दोस्त बन सकता था मेरा या बड़ा भाई
पर अभिभावक तो सिर्फ माता पिता हैं मेरे
मैं लड़की हु इसलिए शायद यह विचार आया होगा
उसके मस्तिष्क में समाज ने यह बिठाया होगा

है पुरुष अगर वह तो लैंगिक श्रेष्ठता का अधिकारी है
उसकी बात सदियों से ही हम महिलाओं पे भारी है
यह आम रिवाज़ है लड़ियों के लिए
भाई छोटा हो या बड़ा उसका संरक्षक बन जाना
हुकुम चलाना बहनों पर और उनका भाग्य सुनिश्चित करना
क्या अधीनता स्वीकार करने से ही सुरक्षा सुनिश्चित होती है
फिर क्यों इतने अभिभावक के बाद भी किस्मत हमारी बद से बत्तर है

हम सदियों से इस दुनियावी जाल में फसते आये हैं
जीवन के हर मोड़ पर नए अभिभावक गड़ते आये है
खुद उठो और संघर्ष करो
हमे साथी की दोस्त की ज़रूरत है
जो बराबरी से सुने हमें और समझ सके
राय दे अपनी पर थोपे नही
हमें अब और अभिभावकों की ज़रूरत नही

जिस रिश्ते में मिलो वैसे ही मिलो
है स्वतंत्रत अगर यह दुनिया तो
कुछ हमे भी जीने दो......अगली बार जब भी मिलो सिर्फ
भाई या दोस्त बनकर मिलो.....

'शाईस्ता शकील हैदर'
 
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