विज्ञापन

स्त्री ही मां है

Shaily

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            क्या बिसात है स्त्री की और क्या कुछ जिम्मेदारी है?
        
                                                    
                            
बाँध पीठ पर शिशु को अपने, युद्ध जीतने जाती है
बच्चे गोदी में ले पत्ती, कहीं चाय की चुनती है
पत्थर कहीं तोड़ती वह, ईंटा-मलबा भी ढोती है

घर-घर बर्तन माजे उसने, झाड़ू-पोछा करती है
पति कच्ची पीकर सोता वो बच्चे पोसा करती है
मद्यप-कामुक पति के जीवन में वो सिर्फ़ बिछौना है
हास्य-रसिक कवि-लेखक की रचना में एक खिलौना है

कहीं बिक रही सऊदी में, वह घर में जिन्दा जलती है
पुत्र-जन्म या फिर दहेज़ की बलि वेदी पर चढ़ती है
कहीं घरेलू हिंसा है तो कहीं तिरस्कृत होती है
ना घर की ना घाट की स्त्री, कुत्ते जैसी लगती है

पति के यौन पिपासा को न्यायालय सही बताते हैं।
अप्राकृतिक यौन को भी, वह न्यायोचित ठहराते हैं
माँ, बीवी, भगिनी या पुत्री, बोलो कहां सुरक्षित है?
संसद से पंचायत तक में वह आरक्षित श्रेणी है…

नर समाज रोकर कहता, हर नारी, नर पर भारी है,
प्रज्वल, बृजभूषण से आगे दिखता सन्देशखाली है
इस बद-तर समाज में रहती सब मातायें स्त्री हैं
सम्मानित वह कैसे हैं ये बड़ी अनोखी 'मिस्ट्री' है।
एक वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

User

1 कविता

View Profile

HIMANSHU CHARAN

3 कविताएं

View Profile

Deepak Sharma

24 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12492 कविताएं

View Profile