आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

स्त्री ही मां है

                
                                                         
                            क्या बिसात है स्त्री की और क्या कुछ जिम्मेदारी है?
                                                                 
                            
बाँध पीठ पर शिशु को अपने, युद्ध जीतने जाती है
बच्चे गोदी में ले पत्ती, कहीं चाय की चुनती है
पत्थर कहीं तोड़ती वह, ईंटा-मलबा भी ढोती है

घर-घर बर्तन माजे उसने, झाड़ू-पोछा करती है
पति कच्ची पीकर सोता वो बच्चे पोसा करती है
मद्यप-कामुक पति के जीवन में वो सिर्फ़ बिछौना है
हास्य-रसिक कवि-लेखक की रचना में एक खिलौना है

कहीं बिक रही सऊदी में, वह घर में जिन्दा जलती है
पुत्र-जन्म या फिर दहेज़ की बलि वेदी पर चढ़ती है
कहीं घरेलू हिंसा है तो कहीं तिरस्कृत होती है
ना घर की ना घाट की स्त्री, कुत्ते जैसी लगती है

पति के यौन पिपासा को न्यायालय सही बताते हैं।
अप्राकृतिक यौन को भी, वह न्यायोचित ठहराते हैं
माँ, बीवी, भगिनी या पुत्री, बोलो कहां सुरक्षित है?
संसद से पंचायत तक में वह आरक्षित श्रेणी है…

नर समाज रोकर कहता, हर नारी, नर पर भारी है,
प्रज्वल, बृजभूषण से आगे दिखता सन्देशखाली है
इस बद-तर समाज में रहती सब मातायें स्त्री हैं
सम्मानित वह कैसे हैं ये बड़ी अनोखी 'मिस्ट्री' है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर