हाँ, हम आज़ाद हैं
संविधान ने दी है
आज़ादी ।
आने-जाने की,
घूमने-टहलने की।
विचारों को
लिखने, बोलने
व्यक्त करने की।
संघ, संगठन, यूनियन,
पार्टी, दल, फेडरेशन
बनाने की।
सभा, रैली जुलूस की,
अपनी बात कहने की,
सत्ता से सवाल करने की।
रहने, बसने,
आशियाना बनाने की।
काम, कारोबार, रोज़गार,
वृत्ति और व्यवसाय चुनने की।
हाँ, हम आज़ाद हैं—
अपनी इच्छा से जीने के लिए,
अन्याय का विरोध करने के लिए,
विरोध जताने के लिए।
लेकिन क्या केवल अधिकारों के मिल जाने भर से
आज़ादी सुरक्षित हो जाती है?
क्या हर आवाज़
बिना ड़र के उठ पाती है?
क्या हर विरोध
को सम्मान मिल पाता है
अधिकार मिलना
आज़ादी की गारंटी नहीं।
जिस दिन हम
उठाना छोड़ देंगे,
उस दिन अधिकार काग़ज़ पर रह जाएँगे
और आज़ादी—
सिर्फ़ एक शब्द ।