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मनुष्यता पराजित न हो।

Shailendra Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दया, क्षमा और युद्ध
        
                                                    
                            

दया करना—
पर इतना भी नहीं
कि करुणा को कायरता
समझ लिया जाए।

क्षमा करना—
पर उसे,
जो अपने अपराध के सामने
अहंकार नहीं,
पश्चात्ताप लेकर आए।

शरण में झुका हुआ सिर
हर बार निर्दोष नहीं होता;
कभी-कभी
झुकना केवल भय होता है,
और कभी
आत्मा का स्वीकार।

युद्ध
संवाद की पहली भाषा नहीं,
उसकी अंतिम विफलता है।
फिर भी हर अधूरा संघर्ष
शांति नहीं होता—
कुछ घाव
अगले युद्ध की प्रतीक्षा करते हैं।

रणभूमि में केवल सैनिक नहीं मरते,
किसी घर का भविष्य मरता है,
किसी माँ की नींद,
किसी बच्चे का विश्वास
और मनुष्य होने का अर्थ भी।

इसलिए युद्ध से पहले
शत्रु की शक्ति नहीं,
अपनी विवेकहीनता को तौलना;
विजय की संभावना से पहले
उसकी कीमत को जानना।

जहाँ न्याय का द्वार खुला हो,
वहाँ तलवार उठाना अहंकार है;
जहाँ हर द्वार पर अन्याय खड़ा हो,
वहाँ प्रतिरोध
केवल अधिकार नहीं,
नैतिक प्रश्न भी है।

लेकिन याद रहे—
युद्ध जीत लेना
न्याय पा लेना नहीं;
शत्रु को झुका देना
सत्य को सिद्ध करना नहीं।

इतिहास
विजेताओं के नाम लिख सकता है,
पर समय पूछता है—
उस विजय के नीचे
कितने मनुष्य दबे थे?

मनुष्य की सबसे बड़ी विजय
शत्रु का विनाश नहीं,
उस शत्रुता का अंत है
जो मनुष्य को
मनुष्य के विरुद्ध खड़ा करती है।

क्योंकि अंततः
विजय वह नहीं
जिसमें दूसरा पराजित हो—
विजय वह है
जिसके बाद
मनुष्यता पराजित न हो।
2 घंटे पहले
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