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मुझे अपना चेहरा दिखाई दिया।

Shailendra Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अंधा उल्लू
        
                                                    
                            

उस रात
उल्लू ने आँखें खोलकर
मुझे देखा था—

बहुत देर तक।

इतनी देर
कि मुझे लगा—
वह मुझे नहीं,
मेरे भीतर बची
आखिरी रोशनी को देख रहा है।

वह सूखी डाल पर बैठा था।
उसके पीछे
आकाश इतना काला था
कि तारे भी
अपनी जगह भूल गए थे।

आँखें खुली थीं उसकी—
बड़ी, स्थिर,
चमकती हुई।

फिर भी—
वह अंधा था।

मैं देर तक उसे देखता रहा।
सोचता रहा—

आँखें खुली हों
और रास्ता दिखाई न दे,
तो अंधा कौन है—
वह उल्लू
या मैं?

उसी क्षण
खिड़की के भीतर
बल्ब काँपा।

पीली-सी रोशनी
दीवार पर फैली।
मेरी परछाईं
अचानक—
मुझसे अलग होकर
खड़ी हो गई।

मेज़ पर
चाय ठंडी पड़ी थी।
दीवार पर
घड़ी की सुइयाँ
थमी-सी थीं।
बिस्तर पर
एक अकेली सलवट थी।

और बाहर—
सूखी डाल पर—
वही अंधा उल्लू।

सड़क सुनसान थी।
फिर भी
कदमों की आवाज़ आती रही—

धीरे-धीरे।
बहुत धीरे।

जैसे कोई
मेरे बाहर नहीं,
मेरे भीतर
चल रहा हो।

तभी पहली बार
मृत्यु का विचार नहीं आया।

उसकी उपस्थिति
महसूस हुई।

वह सामने नहीं थी।
न दरवाज़े पर,
न खिड़की के बाहर।

वह तो
मेरे प्रश्नों के बीच
चुपचाप बैठी थी।

उसके सामने
झूठ टिकता नहीं।
भ्रम ठहरता नहीं।
और नाम—
कितनी देर टिकता है?

अंततः
सिर्फ एक प्रश्न बचता है—

मैं कौन हूँ?

उल्लू ने
धीरे से
गर्दन घुमाई।

उसकी आँखों में
मुझे अपना चेहरा दिखाई दिया।

मैं काँप गया।

पहली बार
समझ आया—

शायद अंधेरा
बाहर नहीं।
भीतर होता है।

आदमी
उसे अपनी आँखों में
लेकर चलता है।

और कभी-कभी—
सबसे अधिक खुली आँखें ही
सबसे गहरी अंधी होती हैं.
2 घंटे पहले
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Rajan

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