हर संस्कार की अपनी अलग तासीर होती है,
ब-मुताबिक़ हर किरदार की तामीर होती है।
संस्कार ही तय किया करते रुख़ ज़िंदगी का,
जिसकी बुनियाद पर ज़िंदगी तामीर होती है।
इन्साँ के नेक या बद आमाल पे ही मुनहसिर,
खुली आँखों से देखे ख़्वाब की ताबीर होती है।
संस्कार ही होते वाहिद सरमाया ज़िंदगी का,
जिनके बूते दुनिया में हमारी तौक़ीर होती है।
जो जितने ख़ूबसूरत संस्कारों का हो मालिक,
वैसी दिलक़श उस शख्स की तस्वीर होती है।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "