बुझ गया मगर दिल की आरज़ू गई नहीं,
मुरझा गया है गुल मगर ख़ुशबू गई नहीं।
दिल-ए-हस्सास के तज़ुर्बों के बर-तरफ़,
इश्क़ में जीने मरने की आरज़ू गई नहीं।
दर-हक़ीक़त दिल टूट जाने के बावजूद,
रू-ब-रू मुलाक़ात की आरज़ू गई नहीं।
जल-जल के ख़ाक हो जाने के बा'द भी,
दिल से उस दिल-जू की आरज़ू गई नहीं।
वीराँ बयाबाँ हुआ दौर-ए-ख़िजाँ में चमन,
मगर गुलज़ार होने की आरज़ू गई नहीं।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "